सबसे ख़तरनाक हालत है "समझ गया" वाला भरोसा
व्याख्या पढ़ते ही लगता है समझ आ गया. फिर असली चार्ट के सामने हाथ रुक जाता है. पढ़ना और फ़ैसला करना दो अलग हुनर हैं.
सिर्फ़ पढ़ने से क्यों नहीं टिकता
व्याख्या में जवाब साथ ही लिखा होता है. जवाब सामने हो तो हर आकार साफ़ दिखता है.
वह याद रखना नहीं, मिलान करना है.
ढककर बताने से क्या बदलता है
दाहिनी तरफ़ ढँक दीजिए, पहले अंदाज़ा लगाइए, फिर खोलिए.
दो चीज़ें होती हैं:
- दर्ज रह जाता है कि आपने किस आधार पर कहा
- गलत निकले तो दिखता है कि उन आधारों में कमज़ोर कौन-सा था
गलत जवाब ज़्यादा कीमती हैं
सही जवाबों से कम सीखने को मिलता है — पता ही नहीं चलता कि तर्क सही था या संयोग.
गलत जवाब अलग हैं. उनसे दिखता है कि आप बार-बार किस आकार पर अटकते हैं. यह हर आदमी का अलग होता है, और आपके सिवा कोई नहीं जान सकता.
इसलिए यही क्रम है
पढ़िए → ढककर बताइए → गलत निकले सवाल जमा कीजिए → उसी आकार को दोबारा.
कदम छोड़ेंगे तो पचास व्याख्याएँ पढ़कर भी चार्ट के सामने वहीं खड़े रहेंगे.
यह सीखने के लिए है, निवेश सलाह नहीं.
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टिप्पणी करने के लिए लॉग इन कीजिएइस पोस्ट का विश्लेषण और भविष्यवाणियाँ लेखक की निजी राय हैं, निवेश सलाह नहीं।